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Current Affair 8.10.2018

In: India
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Created: 08 Oct 2018

बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने हाल ही में घोषणा की है कि पटना में डॉल्फिन रिसर्च सेंटर की स्थापना की जाएगी. यह एशिया का पहला डॉल्फिन रिसर्च सेंटर होगा जिसे इतने बड़े पैमाने पर बनाया जा रहा है.

लगभग 28 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र का निर्माणकार्य जल्द ही शुरू किया जायेगा. पटना विश्वविद्यालय परिसर में दो एकड़ भूखंड पर इस केंद्र का निर्माण किया जायेगा. इसके अतिरिक्त मुंगेर में एक 'ऑब्जरबेटरी' का निर्माण कराया जा रहा है, जहां से डॉल्फिनों को देखा जा सकेगा. गंगा नदी में जाकर डॉल्फिन देखने की व्यवस्था जल्द कराई जाएगी. 

मुख्य बिंदु


•    डॉल्फिनों की संख्या और उपलब्धता की जानकारी के लिए चौसा से साहेबगंज तक सर्वे का काम 42.728 लाख रुपये की लागत से तीन      प्रतिष्ठित विशेषज्ञ संस्थानों द्वारा इसी साल 15 नवंबर से 15 दिसंबर के बीच कराया जाएगा.
•    बिहार में 10 लाख रुपये की लागत से डॉल्फिन पर फिल्म भी बनाई जा रही है तथा डॉल्फिनों को बचाने वाले लोगों को पुरस्कृत करने के    लिए प्रतिरक्षण सह प्रोत्साहन कार्यक्रम चलाया जा रहा है.
•    डॉल्फिन संरक्षण के प्रयासों में इस केंद्र की भूमिका महत्वपूर्ण होगी. डॉल्फिन की जनसँख्या लगातार कम होती जा रही है. 
•    भारत की लगभग आधी डॉल्फिन जनसँख्या बिहार में ही है, देश में डॉलफिन की अनुमानित जनसँख्या लगभग 3,000 है.

गंगा नदी डॉल्फिन

गंगा नदी में पाई जाने वाली डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम प्लाटानिस्टा गंगेटिका है. यह विश्व की ताज़े पानी की चार डॉल्फिन प्रजातियों में से एक है. भारत के अलावा यह यांगत्जी नदी, पाकिस्तान की सिन्धु तथा अमेज़न नदी में भी पायी जाती हैं. केंद्र सरकार ने 05 अक्टूबर 2009 को गंगा डॉल्फिन को भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया है. यह अपने शिकार को अल्ट्रासोनिक ध्वनि से ढूंढती है. गंगा नदी डॉल्फिन मार्ग ढूँढने, भोजन, खतरे से बचने इत्यादि सभी गतिविधियों के लिए अल्ट्रासोनिक ध्वनि का उपयोग करती है.

बिहार व उत्तर प्रदेश में इसे 'सोंस' जबकि आसामी भाषा में 'शिहू' के नाम से जाना जाता है. वर्ष 1996 में ही इंटरनेशनल यूनियन ऑफ़ कंजर्वेशन ऑफ़ नेचर इन डॉल्फिनों को विलुप्तप्राय जीव घोषित कर चुका था. गंगा में डॉल्फिनों की संख्या में वृद्धि 'मिशन क्लीन गंगा' के  प्रमुख आधार स्तम्भ होगा, क्योंकि यह माना जा रहा है कि जिस प्रकार बाघ जंगल की सेहत का प्रतीक है उसी प्रकार डॉल्फिन गंगा नदी के स्वास्थ्य की निशानी है.

डॉल्फिन संरक्षण उपाय

वर्ष 1997 में पर्यावरण मंत्रालय ने गंगा नदी संरक्षण कार्यक्रम आरंभ किया था. इसके अंतर्गत डॉलफिन की संख्या के वैज्ञानिक डेटाबेस बनाने की योजना बनाई गई थी. बिहार के भागलपुर जिले में विक्रमशिला गंगेटिक डॉलफिन अभ्यारण्य स्थित है, यह देश का एक मात्र डॉलफिन अभ्यारण्य है यह गंगा नदी में 50 किलोमीटर में फैला हुआ है.

महाराष्ट्र के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, पालघर, ठाणे और रायगढ़ जिलों में पैदा होने वाले अल्फोंसो आम को हाल ही में ‘भौगोलिक चिन्ह’ (जीआई) के तौर पर पंजीकृत किया गया है. 

हाल ही में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री सुरेश प्रभु ने भारतीय वस्तुओं के भौगोलिक चिन्ह के लिए ‘लोगो और टैगलाइन’ को लॉन्च करते हुए कहा कि इससे कलाकारों उत्पादनकर्ताओं की बौद्धिक संपदा का उनका अधिकार तथा उस उत्पाद के उत्पत्ति को सही अधिकार मिल सकेगा.

अल्फोंसो (हापुस) आम की पैदावार
अल्फोंसो (हापुस) आमों की सबसे बेहतरीन किस्म महाराष्ट्र के कोंकण इलाके में स्थित सिंधुदुर्ग जिले की तहसील देवगढ़ में उगायी जाती है, साथ ही सबसे अच्छे आम सागर तट से 20 किलोमीटर अंदर की ओर स्थित जमीन पर ही उगते हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र का रत्नागिरि जिला, गुजरात के दक्षिणी जिले वलसाड और नवसारी भी अल्फोंसो की पैदावार के लिए प्रसिद्ध हैं. कुछ समय पूर्व से बिहार के कुछ क्षेत्रों में भी अल्फोंसो की पैदावार शुरू की गयी है.

कोंकण अल्फोंसो के बारे में जानकारी
•    अल्फोंसो को आमों का राजा कहा जाता है और महाराष्ट्र में इसे हापुस के नाम से जाना जाता है. 
•    इसके लजीज स्वाद, अनोखी खुशबू और चमकदार रंग के चलते इसकी भारत के अलावा अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में काफी मांग हैं. 
•    विश्व में यह काफी लंबे समय से मशहूर फल रहा है और इसे जापान, कोरिया तथा यूरोप को निर्यात किया जाता रहा है. 
•    हाल ही में अमेरिका और आस्ट्रेलिया ने भी अपने बाजारों में इसके आयात को मंजूरी दी है. 
•    भारत में पहला जीआई टैग दार्जिलिंग चाय को 2004 में दिया गया था और देश में इस टैग को हासिल करने वाले कुल उत्पादों की संख्या 325 हैं.

भौगोलिक चिन्ह (जीआई टैग)
•    भौगोलिक चिन्ह किसी भी उत्पाद के लिए एक चिन्ह होता है जो उसकी विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष गुणवत्ता और पहचान के लिए    दिया जाता है और यह सिर्फ उसकी उत्पत्ति के आधार पर होता है. 
•    ऐसा नाम उस उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है. 
•    दार्जिलिंग चाय, महाबलेश्वर स्ट्रोबैरी, जयपुर की ब्लूपोटेरी, बनारसी साड़ी और तिरूपति के लड्डू कुछ ऐसे उदाहरण है जिन्हें जीआई टैग    मिला हुआ है.
•    जीआई उत्पाद दूरदराज के क्षेत्रों में किसानों, बुनकरों शिल्पों और कलाकारों की आय को बढ़ाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा सकते हैं. 
•    ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हमारे कलाकारों के पास बेहतरीन हुनर, विशेष कौशल और पारंपरिक पद्धतियों और विधियों का ज्ञान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है और इसे सहेज कर रखने तथा बढ़ावा देने की आवश्यकता है.